धन योग क्या है?
वैदिक ज्योतिष में "धन योग" उन ग्रह-संयोगों को कहा जाता है जिन्हें शास्त्रों ने संपत्ति और संसाधनों के भाव से जोड़ा है। यह पेज बताता है कि ये संयोग किन भावों और ग्रहों से बनते हैं और ग्रंथों में इनका वर्णन कैसे किया गया है।
कौन-से भाव जुड़े हैं। परंपरा में दूसरा भाव संचित संपत्ति और कुटुंब से, ग्यारहवाँ भाव आय और लाभ से, पाँचवाँ भाव पूर्व-पुण्य और बुद्धि से, तथा नवाँ भाव भाग्य से जोड़ा जाता है। धन योग की अधिकांश परिभाषाएँ इन्हीं भावों के स्वामियों के आपसी संबंध पर टिकी हैं।
संयोग कैसे बनते हैं। सामान्य शास्त्रीय नियम यह है कि जब दूसरे और ग्यारहवें भाव के स्वामी आपस में या केंद्र-त्रिकोण के स्वामियों से युति, दृष्टि या परिवर्तन में आते हैं, तो उसे धन-संबंधी योग कहा जाता है। कुछ नामित योग भी हैं, जैसे लक्ष्मी योग, जिसमें नवमेश और लग्नेश की स्थिति देखी जाती है।
बल भी देखा जाता है। ग्रंथ केवल संयोग की उपस्थिति नहीं, उसमें शामिल ग्रहों का बल भी देखने को कहते हैं: राशि, नवांश, दिग्बल और दशा-क्रम। एक ही नाम का योग दो कुंडलियों में अलग बल का हो सकता है, इसलिए केवल नाम गिन लेना पर्याप्त नहीं माना जाता।
परंपरा का पाठ, भविष्यवाणी नहीं। धन योग कुंडली का वर्णन है, जैसा ग्रंथ उसे पढ़ते हैं; यह किसी के आर्थिक परिणाम की भविष्यवाणी नहीं है। इसी कारण यहाँ कोई बाज़ार-संबंधी दावा नहीं किया जाता।
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